खतरनाक होती है अप्सरा,वीर, गंधर्व और किन्नर साधना, ये होता है असर



तांत्रिक (tantric) कैसे करते है नकारात्मक शक्तियों का आव्हान और तांत्रिक साधानों के बारे में हमने पहले भाग में बताया था कि दो तरह की साधना होती है पहली दक्षिणमार्गी और दूसरी वाममार्गी। वाममार्गी वे साधनाएं होती है जिसमें तांत्रिक गलत उद्देश्य और नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से दैविय शक्तियों और नकारात्मक शक्तियों का आव्हान कर अपनी इच्छाओं की पूर्ति के लिए उन्हें बाध्य करता है। इस भाग में हम अन्य विधियों के बारे में हमारे पाठकों को जानकारी दे रहे हैं। जानते है इन खतरनाक विधियों के बारे में... अप्सरा साधना : हिन्दू धर्म शास्त्रों (shastro) के अनुसार अप्सरा देवलोक में रहने वाली अनुपम, अति सुंदर, अनेक कलाओं में दक्ष, तेजस्वी और अलौकिक दिव्य स्त्री है। वेद और पुराणों में उल्लेख मिलता है कि देवी, परी, अप्सरा, यक्षिणी, इन्द्राणी और पिशाचिनी आदि कई प्रकार की स्त्रियां हुआ करती थीं। उनमें अप्सराओं को सबसे सुंदर और जादुई शक्ति से संपन्न माना जाता है। अप्सरा साधना : माना जाता है कि अप्सराएं गुलाब, चमेली, रजनीगंधा, हरसिंगार और रातरानी की गंध पसंद करती है। वे बहुत सुंदर और लगभग 16-17 वर्ष की उम्र समान दिखाई देती है। अप्सरा साधना के दौरान साधक को अपनी यौन भावनाओं पर संयम रखना होता है अन्यथा साधना नष्ट हो सकती है। संकल्प और मंत्र के साथ जब साधना संपन्न होती है तो अप्सरा प्रकट होती है तब साधन उसे गुलाब के साथ ही इत्र भेंट करता है। उसे फिर दूध से बनी मिठाई, पान आदि भेंट दिया जाता है और फिर उससे जीवन भर साथ रहने का वचन लिया जाता है। ये चमत्कारिक शक्तियों से संपन्न अप्सरा आपकी जिंदगी को सुंदर बनाने की क्षमता रखती है। कितनी हैं अप्सराएं : शास्त्रों (shastro) के अनुसार देवराज इन्द्र के स्वर्ग में 11 अप्सराएं प्रमुख सेविका थीं। ये 11 अप्सराएं हैं- कृतस्थली, पुंजिकस्थला, मेनका, रम्भा, प्रम्लोचा, अनुम्लोचा, घृताची, वर्चा, उर्वशी, पूर्वचित्ति और तिलोत्तमा। इन सभी अप्सराओं की प्रधान अप्सरा रम्भा थी। अलग-अलग मान्यताओं में अप्सराओं की संख्या 108 से लेकर 1008 तक बताई गई है। कुछ नाम और- अम्बिका, अलम्वुषा, अनावद्या, अनुचना, अरुणा, असिता, बुदबुदा, चन्द्रज्योत्सना, देवी, घृताची, गुनमुख्या, गुनुवरा, हर्षा, इन्द्रलक्ष्मी, काम्या, कर्णिका, केशिनी, क्षेमा, लता, लक्ष्मना, मनोरमा, मारिची, मिश्रास्थला, मृगाक्षी, नाभिदर्शना, पूर्वचिट्टी, पुष्पदेहा, रक्षिता, ऋतुशला, साहजन्या, समीची, सौरभेदी, शारद्वती, शुचिका, सोमी, सुवाहु, सुगंधा, सुप्रिया, सुरजा, सुरसा, सुराता, उमलोचा आदि। वीर या बीर साधना : सभी वीरों की शक्तियां एक-दूसरे से भिन्न हैं। ये अलग-अलग शक्तियों से संपन्न होते हैं। गुप्त नवरात्रि (navratri) में और कुछ विशेष दिनों में वीर साधना की जाती है। वीर साधना को तांत्रिक साधना के अंतर्गत माना गया है। मूलत: 52 वीर हैं। जानिए 52 वीरों के नाम... वीरों के विषय में सर्वप्रथम पृथ्वीराज रासो में उल्लेख है। वहां इनकी संख्या 52 बताई गई है। इन्हें भैरवी के अनुयायी या भैरव का गण कहा गया है। इन्हें देव और धर्मरक्षक भी कहा गया है। मूलत: ये सभी कालिका माता के दूत हैं। उत्तरप्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, राजस्थान, पंजाब आदि प्रांतों में कई वीरों की मंदिरों में अन्य देवी और देवताओं के साथ प्रतिमाएं भी स्थापित हैं। राजस्थान में जाहर वीर, नाहर वीर, वीर तेजाजी महाराज आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। कहते हैं कि वीर साधना एक बंद कमरे में, श्मशान में या किसी एकांत स्थान पर की जाती है, जहां कोई आता-जाता न हो। कई दिन, कई रातों तक महाकाली की पूजा करने के पश्चात कहा जाता है कि पूजा के दौरान एक ऐसा क्षण आता है, जब काली के दूत सामने आते हैं और साधक की मनोकामना पूर्ण करते हैं। वीर साधना को तांत्रिक साधना के अंतर्गत माना जाता है इसलिए ध्यान रहे कि यह साधना किसी गुरु या जानकार से पूछकर ही करें। गंधर्व साधना : गंधर्वों को देवताओं का साथी माना गया है। गंधर्व विवाह, गंधर्व वेद और गंधर्व संगीत के बारे में आपने सुना ही होगा। एक राजा गंधर्वसेभी हुए हैं जो विक्रमादित्य के पिता थे। गंधर्व नाम से देश में कई गांव हैं। गांधार और गंधर्वपुरी के बारे में भी आपने सुना ही होगा। दरअसल, गंधर्व नाम की एक जाति प्राचीनकाल में हिमालय के उत्तर में रहा करती थी। उक्त जाति नृत्य और संगीत में पारंगत थी। वे सभी इंद्र की सभा में नृत्य और संगीत का काम करते थे। गन्धर्व नाम से एक अकेले देवता थे, जो स्वर्ग के रहस्यों तथा अन्य सत्यों का उद्घाटन किया करते रहते थे। वे देवताओं के लिए सोम रस प्रस्तुत करते थे। विष्णु पुराण के अनुसार वे ब्रह्मा के पुत्र थे और चूंकि वे मां वाग्देवी का पाठ करते हुए जन्मे थे, इसीलिए उनका नाम गंधर्व पड़ा। दरअसल, ऋषि कश्यप की पत्नी अरिष्ठा से गंधर्वों का जन्म हुआ। अथर्ववेद में ही उनकी संख्या 6333 बतायी गई है। नाग और सर्प साधनाएं : हिन्दू धर्म में नाग और सर्प को चमत्कारिक माना जाता है। नाग और सर्प में दिव्य आत्माएं निवास करती हैं। प्राचीनकाल में नाग नामक एक रहस्यमयी जाती हुआ करती थी। प्रजापकित कश्यप की पत्नी कद्रू से नागों की उत्पत्ति हुई है। नागों में प्रमुख- अनंत (शेष), वासुकी, तक्षक, कार्कोटक और पिंगला- उक्त पांच नागों के कुल के लोगों का ही भारत में वर्चस्व था। यह सभी कश्यप वंशी थे। इन्ही से नागवंश चला। नागवंश का संक्षिप्त परिचय नाग से संबंधित कई बातें आज भारतीय संस्कृति, धर्म और परम्परा का हिस्सा बन गई हैं, जैसे नाग देवता, नागलोक, नागराजा-नागरानी, नाग मंदिर, नागवंश, नाग कथा, नाग पूजा, नागोत्सव, नाग नृत्य-नाटय, नाग मंत्र, नाग व्रत और अब नाग कॉमिक्स। ग्रामिण क्षेत्रों में बहुत से लोगों के शरीर में नागदेवता आकर लोगों की समस्या का समाधान करते हैं। सर्पो तथा नागों ने देवताओं की कठिन साधना, तपस्या की तथा उन के निकट का ही विशेष पद भी प्राप्त किया। आज भी नागों की कई आलौकिक शक्तियां विचरण कर रही है। नागों के आह्?वान और उनकी साधना करके मनचाही सफलता और मनोकामना पाई जाती है। नाग पूजा और साधना के विशेष दिन होते हैं। कद्रू को नागों की माता कहा गया है। देवी मनसा, जो भगवान शिव की बेटी हैं, उन्हें भी नाग माता कहा जाता हैं, जिनका विवाह जरत्कारू नाम के ऋषि के साथ हुआ था। जनमेजय द्वारा सर्पों के नाश के लिए किए गए यज्ञ से सर्पों की रक्षा की थी देवी मनसा के पुत्र आस्तिक ने। सर्प प्रजाति के मुख्य 12 सर्प हैं जीने के नाम- 1. अनंत 2. कुलिक 3. वासुकि 4. शंकुफला 5. पद्म 6. महापद्म 7. तक्षक 8. कर्कोटक 9. शंखचूड़ 10. घातक 11. विषधान 12. शेष नाग। किन्नर और किन्नरियां साधना : प्राचीनकाल में देवाताओं के साथ जहां गंधर्व रहते थे वहीं एक दूसरे क्षेत्र में किन्नर जाति के लोग भी रहते थे। किन्नर जाति के लोग पहाड़ी क्षेत्र में रहते थे। ये लोग अपने अनुपम तथा मनमोहक सौन्दर्य के लिए प्राचीन काल से ही प्रसिद्ध हैं। किन्नरों को मृदुभाषी तथा गायन में निपुण माना गया है। हिन्दू तंत्र ग्रंथों में किन्नरियों को विशेष स्थान प्राप्त है। किन्नरियों में रूप परिवर्तन की अद्भुत काला होती है। गायन तथा सौंदर्यता हेतु इनकी साधना विशेष लाभप्रद हैं। परिणामस्वरूप प्राचीन काल से किन्नरियों की साधना ऋषि मुनियों द्वारा की जाती हैं। किन्नरियों का वरदान अति शीघ्र तथा सरलता से प्राप्त हो जाता हैं। माना जाता है कि प्रमख रूप से छह किन्नरियों का समूह है- 1. मनोहारिणी किन्नरी 2. शुभग किन्नरी 3. विशाल नेत्र किन्नरी 4. सुरत प्रिय किन्नरी 5. सुमुखी किन्नरी और 6. दिवाकर मुखी किन्नरी। नायिका साधना : यक्षिणियां तथा अप्सराओं की उपजाति में नायिकाएं आती हैं। यह भी यक्षिणियों और अप्सराओं की तरह मन मुग्ध करने वाले सौन्दर्य से परिपूर्ण होती है। इनकी साधना वशीकरण तथा सुंदरता प्राप्ति हेतु की जाती हैं। माना जाता है कि नारियों को आकर्षित करने का हर उपाय इनके पास हैं। ये मुख्यत: 8 हैं- 1. जया 2. विजया 3. रतिप्रिया 4. कंचन कुंडली 5. स्वर्ण माला 6. जयवती 7. सुरंगिनी 8. विद्यावती। इन नायिकाओं का भी इस्तेमाल देवता लोग ऋषि-मुनियों की तपस्या भंग करने के लिए किया करते थे। अन्य साधनाएं : इसके अलावा डाकिनी-शाकिनी, विद्याधर, सिद्ध, दैत्य, दानव, राक्षस, गुह्मक, भूत, वेताल, अघोर और रावण आदि की साधना भी होती है। वैसे हम यहां साबर साधना के बारे में बता रहे हैं। यह साधाना तुरंत सिद्ध होने वाली और असरकारक होती है। साबर साधनाएं कई प्रकार की होती है।